निजी स्कूलों की लूट पर सैलजा का वार: “शिक्षा के नाम पर कमीशनखोरी का बड़ा खेल!
रमेश गोयत
चंडीगढ़, 5 अप्रैल: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव और सिरसा से सांसद कुमारी सैलजा ने निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों से की जा रही मनमानी वसूली पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही निजी स्कूल संचालकों ने अभिभावकों की जेबें ढीली करनी शुरू कर दी हैं, और सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सरकार ने खुद ही इन स्कूलों को अभिभावकों को लूटने का ठेका दे दिया हो।
सैलजा ने कहा कि अगर सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार होता, तो अभिभावक मजबूरी में निजी स्कूलों का रुख न करते। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा के नाम पर कमीशनखोरी का बड़ा खेल चल रहा है, जिसमें स्कूल संचालक, प्रकाशक और बुक सेलर सब मिले हुए हैं।
किताबों-यूनिफॉर्म की आड़ में कमीशनखोरी
सांसद सैलजा ने कहा कि निजी स्कूल अभिभावकों को निर्धारित दुकानों से ही महंगी किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। नर्सरी से आठवीं कक्षा तक कॉपी-किताबों के सेट 3,000 से 7,800 रुपये तक में बेचे जा रहे हैं।
उन्होंने खुलासा किया कि एक सामान्य किताब जिसकी कीमत 100 रुपये होनी चाहिए, उसे 500 रुपये में बेचा जाता है ताकि उसमें से 30% स्कूल संचालक, 20% बुकसेलर और बाकी पब्लिशर व मार्केटिंग को कमीशन दिया जा सके। इतना ही नहीं, हर साल किताबों में एक-दो अध्याय बदलवा दिए जाते हैं ताकि छात्र पुरानी किताबें न खरीद सकें।
“एनसीईआरटी की किताबों से दूरी क्यों?”
सैलजा ने सवाल उठाया कि जब शिक्षा विभाग ने एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य की हैं, तो निजी स्कूल अपने निजी प्रकाशन की किताबें क्यों पढ़ा रहे हैं? उन्होंने कहा कि एनसीईआरटी की किताबों में कोई कमीशन का खेल नहीं होता, इसलिए स्कूल संचालक उन्हें नजरअंदाज करते हैं।
मनोवैज्ञानिक दबाव से अभिभावकों की जेब कट रही
उन्होंने आरोप लगाया कि निजी स्कूल छोटी कक्षाओं के लिए ज्यादा महंगी किताबें बेचकर अभिभावकों पर मानसिक दबाव बनाते हैं। बच्चों के उज्जवल भविष्य का सपना दिखाकर उनसे मनमाने दाम वसूले जा रहे हैं।
सरकार से कड़े कदम उठाने की मांग
कुमारी सैलजा ने सरकार से मांग की कि अभिभावकों को लूट से बचाने के लिए सख्त कदम उठाए जाएं और सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को बेहतर बनाया जाए, जिससे आम आदमी को राहत मिल सके। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब शिक्षा को व्यापार नहीं, सेवा का माध्यम बनाया जाए।
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